वाद्ययंत्र
1 तत वाद्ययंत्र :- जिन वाद्ययों में तार के द्वारा स्वरों की उत्पत्ति होती
है वे तार, तंतु या तत् वाद्य कहलाते है। इनमें से जिन्हें गज की सहायता से बजाया जाता है। वे वितत् वाद्य कहलाते है।
2 सुषीर वाद्ययंत्र :- जो वाद्य फूंककर बजाये जाते है।
3 अवनद्य/ताल वाद्ययंत्र :- इस श्रेणी में चमड़े से मंढ़े हुए ताल वाद्ययंत्र आते है।
4 घन वाद्ययंत्र :- जिन वाद्य में चोट या आघात से स्वर उत्पन्न होते है। जो धातु निर्मित होते है घन वाद्य कहलाते है।
1 कमल साकर खाँ (जैसलमेर) – कामायचा का जादूगर
2 पैपे खाँ (जैसलमेर) – सूरनाई का जादूगर
3 जहुर खाँ मेवाती (अलवर) – भपंग का जादूगर
4 सद्दीख खाँ (बाड़मेर) – खड़ताल का जादूगर
5 रामकिशन सोलंकी (पुष्कर) – नगाड़े का जादूगर
6 चांद मोहम्मद खाँ – शहनाई वादक
(राजस्थान का बिस्मिल्ला)

SUBJECT QUIZ

राजस्थानी भाषा एवं साहित्य :-

  • 1961 की गणना के अनुसार राजस्थान में 73 बोलियाँ थी।
  • राजस्थानी भाषा दिवस 21 फरवरी को मनाया जाता है।
  • राजस्थान के लोगों की मात्रभाषा राजस्थानी है। जिसकी लिपि
    तत् वाद्ययत्र – सारंगी, इकतारा, रावणहत्था, गुजरी, अपंग, बपंग, कामायचा, सुरमण्डल, रबाब, रबाज, दुकाको, सुरिन्दा, जंतर, तंदूरा/चौतारा/वेणो, चिकारा।
    सुषीर वाद्ययंत्र – अलगोजा, सतारा, मशक, शंख, पूंगी, मोरचंग, नागफनी, करणा, बांकिया, तारपी, पावरी, नड़, भुंगल/रणभेरी, बांसूरी, सींगा/सींगी।
    अवनद्य/ताल वाद्ययंत्र – मृदंग या पखावज, ढोलक, नगाड़ा, नोवत, दमामा (टामक), मांदल, चंग, डफ, डेरू, खंजरी, धौंसा, तासा, कुंडी, पाबूजी के माटे/माठ, कमर ।
    घन वाद्ययंत्र – झालर, झांझ, मंजीरा, रमझोल, करताल, खड़ताल, भरनी, घड़ा, गरासियों की लेजिम, घुरालियों,
    घोरिया, थालीसर, ठिसकी, टोकर (बड़ा घंटा), टाली (छोटा घंटा), पीटोड़ (लकड़ी का बना वाद्ययंत्र जिसका आकार महिलाओं के पर्स जैसा)।

Current Affairs

आभूषण :-
सिर व मस्तक – मांगटीका, शीशफूल, रखड़ी, श्रृंगार पट्टी, बोरला, टिकला, मेमंद, दामणी, फीणी, सांखली, टीडीभलको।
कान – कुण्डल, बाली, बाले, झुमका, कनोती, ओगणिया, पीपल पत्ते, सुरलिया, झेला, लटकन, अंगोट्या, मुरकी, झमेला, माकड़ी, बजट्टी।
नाक – चोप, बारी, लोंग, कांटा, बेसरी, चूनी।
दांत – रखन, चूंप।
गला व छाती – चैन, मंगलसूत्र, टेवटा, जंतर, हंसली, हमेल, गलपटिया, तीमणिया, ठस्सी, कंठी, सीतारानी हार, जोल्या, खंगाली, बादलिया, चंद्रमाला, रानीहार, मांदलिया, चंपाकली, निवोरी, चौकी, कंठसरी, जालरो, बजन्टी।
बाजू – बाजूबंद, टडड़ा, अणत।
हाथ – चूड़-चूड़ी, कड़ा-पाटला, बगड़ी, कंगन, गोखरू, हस्तबंद, पुंची, नोगरी, मोखड़ी (लाख का कड़ा), बल्लया, हथफूल, हारपान।
अंगुली – अंगुठी, बीटी, मुंदड़ी, छल्ला, दामणा, अरसी (अंगुठे की अंगुठी)। कमर – तगड़ी/तागड़ी, कणकती, सटका, कंदोरा, करधनी।
पैर – पायल/पायजेब, तोड़िया, झांझर, नेवरी, तेधड़, कड़ला, जोधपुरी जोड़, अबल्या, टणका, छड़,
पैर की अंगुली – बिछिया, बिछुड़ी, चटकी, फोलरी।

मुड़िया है। इसे महाजनी व बनियाणवी भी कहा जाता है।
सामान्यतया यह स्वीकार किया जाता है कि 11वीं सदी के पूर्वाद्ध में गुर्जरी अपभ्रंश से प्राचीन राजस्थानी का विकास हुआ। राजस्थानी के स्वतंत्र स्वरूप का विकास 16वीं सदी से माना जाता है।

NOTES


Leave a Reply