1 सती/सहगमन/सहमरण/अन्वारोहण प्रथा :-

  • राजस्थान में सतीप्रथा की सर्वप्रथम जानकारी 861 ई. के घटियाला शिलालेख (जोधपुर) से मिलती है। जिसमें सेनापति राणुका की पत्नि संपल देवी सती हुई।
  • सतीप्रथा पर सर्वप्रथम रोक राज्य में 1822 ई. में बूंदी रियासत के शासक विष्णुसिंह ने लगाई।
  • ब्रह्म समाज के संस्थापक राजा राम मोहनराय के प्रयासों से 1829 ई. में लार्ड विलियम बैन्टिग ने सतीप्रथा निवारण अधिनियम बनाया। जिसके तहत् सर्वप्रथम रोक कोटा रियासत ने लगायी। * हाड़ौती में इस प्रथा को चार्ल्स विलकिन्स ने बंद किया था।
  • राजस्थान में अंतिम सती कैप्टन मोहनसिंह की पत्नि रूपकंवर (दिवराला गाँव, सीकर (1987 ई.)) थी। इस सती महिमा कांड के बाद राजस्थान के सभी सती मेलों पर रोक लगा दी गई।

SUBJECT QUIZ

2 महासती/अनुमरण :-

पति की किसी ज्ञात वस्तु के साथ सती होना महासती कहलाता है। मृत पुत्र के साथ भी स्त्रियाँ सती होती थी जिसे माँ सती कहा गया।
3 कन्याओं व बालकों के क्रय-विक्रय पर रोक :-

इस पर सर्वप्रथम रोक 1831 में कोटा रियासत ने लगाई। 16 फरवरी, 1847 को जयपुर राज्य ने इस व्यापार को अवैध घोषित कर दिया।

4 कन्या वध पर रोक :- हाड़ौती के पी.ए. विलकिन्स के प्रयासों से 1833-34 में क्रमशः कोट-बूंदी रियासत ने इस पर रोक लगायी।

ONE LINER QUESTION ANSWER

5 दास प्रथा :- दास प्रथा पर रोक लगाने का प्रयास सर्वप्रथम 1562 ई. में अकबर ने किया। * 1832 ई. में लार्ड विलियम बैन्टिक ने दासप्रथा अधिनियम पारित किया। जिसके तहत् सर्वप्रथम रोक कोटा रियासत ने लगाई।

6 डावरिया प्रथा :- राजा, महाराजा, सामंत व जागीरदार अपनी पुत्री के विवाह के अवसर पर अपनी पुत्री के साथ दहेज के रूप में कुछ कुंवारी कन्याओं को भेजते थे जिन्हें डावरी या डावरिया कहा जाता था। (एक के साथ एक या अनेक फ्री)

7 समाधि प्रथा :- समाधि प्रथा पर रोक 1844 ई. में जयपुर के प्रशासक लुडलो ने लगायी।

NOTES

8 डाकण प्रथा :-

  • इसका सर्वाधिक प्रचलन मेवाड़ के जनजातीय क्षेत्रों में है।
  • मेवाड़ के शासक स्वरूपसिंह के काल में 1853 ई. में मेवाड़ भील कोर (M.B.C.) के कमाण्डर J.C. ब्रुक ने डाकण प्रथा पर रोक लगायी।

9 विधवा विवाह प्रथा :-

  • ईश्वर चन्द्र विद्यासागर के प्रयासो से 1856 ई. में लार्ड डलहौजी ने विधवा पुनर्विवाह अधिनियम बनाया।
  • चांदकरण शारदा ने “विधवा विवाह” नामक पुस्तक लिखी।

10 बाल विवाह प्रथा :-

  • भारत में बाल विवाह सर्वाधिक अक्षय तृतीया/आखातीज/अबुझ सावा पर होते है।
  • राज्य में बाल विवाह को रोकने का पहला प्रयास 1885 ई. में जोधपुर के प्रधानमंत्री सर प्रताप ने किया था।
  • अजमेर के हरविलास शारदा के प्रयासों से बाल विवाह निरोधक अधिनियम 1929 ई. में पारित हुआ। जो पूरे देश में 1 अप्रैल, 1930 से लागू हुआ।
  • यह अधिनियम शारदा एक्ट के नाम से जाना है।
  • इस अधिनियम में विवाह की न्यूनतम आयु 18 व 14 वर्ष निर्धारित की गई।

11 दहेज प्रथा :- भारत सरकार ने दहेज प्रथा निवारण अधिनियम 1961 में पारित किया।

12 बंधुआ मजदूर/सागड़ी प्रथा/हाली प्रथा :- सागड़ी प्रथा निवारण अधिनियम 1961 ई. में पारित हुआ।

13 मौताणा प्रथा :- जनजातियों में किसी पुरुष या महिला की अकाल मृत्यु किसी व्यक्ति विशेष यादुर्घटनावश हो जाती है तो उस व्यक्ति के बदले जो रूपया या धन मांगा जाता है। मौताणा कहलाता है। मौताणा उदयपुर संभाग के आदिवासियों में सदियों पुरानी सामाजिक परम्परा है। मौताणा का अर्थ “मरने के बाद खून खराबे के बीच हर्जाना वसूलना” है।

14 चढ़ोतरा प्रथ :- आदिवासी परिवार के किसी महिला, पुरुष की मृत्यु की सूचना मिलते ही उसके परिवार एवं गोत्र के लोग ढोल बजाते हुए तीर-कमान, लाठी-भाले, तलवारें आदि लेकर मृत्यु स्थल पर पहुंचते है। मौके पर मृत्यु अप्राकृतिक पाए जाने पर आरोपित पक्ष पर जो दंड सुनाया जाता है, उसे चढ़ोतरा कहा जाता है।

15 चारी प्रथा :- खैराड़ क्षेत्र में यह प्रथा प्रचलित है। इसमें लड़की के परिवार वाले लड़के के घर वालों से दहेज की तरह नकद राशि लेते है। चारी की इस राशि के लालच में ही लड़की वाले वैवाहिक जीवन को ज्यादा नहीं चलने देते थे और फिर चारी लेकर लड़की को दूसरी जगह भेज देते थे। यह प्रथा कमजोर व पिछड़े वर्ग में ज्यादा प्रचलित है।

16 नाता प्रथा :- राजस्थान में नाता प्रथा एक प्रकार से पुर्नविवाह ही है। नाता संबंधों का एक प्रकार है। इस प्रथा में पत्नी अपने पूर्व पति को छोड़कर किसी दूसरे पुरुष को अपना पति बना लेती है। यह प्रथा अधिकांशतया ग्रामीण क्षेत्रों में जनजाति के लोगों में प्रचलित है।

17 संथारा प्रथा :- संथारा प्रथा का विधान जैन ग्रंथों में उल्लेखित है। इस प्रथा में अन्न, जल त्याग कर समत्वभाव से देह त्याग किया जाता है। संथारा आत्महत्या नहीं है।

CURRENT AFFAIRS

18 छेड़ा फाड़ना :-

  • इस प्रथा का सर्वाधिक प्रचलन आदिवासियों में भीलों में है।
  • इसमें महिला अपनी ओढ़नी का पल्लू फाड़कर अपने पहले पति का दे देती है। एवं दूसरे पति के साथ रहने के लिए चली जाती है।
  • महिला के दूसरे पति द्वारा पहले पति को हर्जाने के रूप में दी गई धनराशि हर्जाना राशि कहलाती है।

19 लोकाई :- आदिवासियों में मृत्यु के अवसर पर दिये जाने वाला भोज लोकाई या कांदिया कहलाता है।

20 लीला मोरिया :- आदिवासियों में प्रचलित एक विवाह संस्कार है। इसमें दूल्हे के घर पर दूल्हे को वालर बांधकर खाट पर बैठाकर नृत्य किया जाता है, जिसे लीला मोरिया के नाम से जाना जाता है।


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