( 1) राजस्थान की लोक कलाएं

( 1) उस्ता कला – ऊंट की खाल पर की गई कलात्मक चित्रकारी उस्ता कला कहलाती हैं कलाकार उस्ताद कहलाते हैं इसका प्रमुख क्षेत्र बीकानेर, बीकानेर में इस कला को लाने का श्रेय महाराज अनूप सिंह को जाता है
प्रमुख कलाकार – हिसामुद्दीन उस्ता
( 2) मयेरना कला धार्मिक स्थानों पर देवी देवताओं का चित्र बनाना मयेरना कला कहलाता है इसका प्रमुख केंद्र बीकानेर देवी देवताओं का चित्रांकन नम दीवारों पर किया जाता है
( 3) थेवा कला – हरा कांच पर सोने के सूक्ष्म चित्रांकन को थेवा कला कहा जाता है थेवा कला के लिए प्रतापगढ़ का राज सोनी परिवार प्रसिद्ध है थेवा कला की जानकारी – सिर्फ पुरुषों को ही होते हैं
( 4) मीनाकारी सोने के आभूषणों पर रंगों की जड़ाई मीनाकारी कहलाती हैं राजस्थान में जयपुर की मीनाकारी प्रसिद्ध है यह मूलतः ईरान (पर्शिया) भी कहलाती है
राजस्थान में मीनाकारी लाने का श्रेय मानसिंह -I को जाता है
(5) टेराकोटा कला – बिना सांचे कि उपयोग के मिट्टी की मूर्तियां व खिलौने बनाना टेराकोटा कला कहलाती है
प्रमुख क्षेत्र – मोलेला (नाय द्वारा) (राजस्थान) प्रमुख कलाकार मोहनलाल कुम्हार टेराकोटा को प्राप्त है
(6) फड (7) पॉटरी कला (8) कोप्तगित

चुरु (1) गोयनका की हवेली चुरु के किन अय हवेलिया, सुराणों के हवामहल रामविलास गोयनका की हवेली, मंत्रियों की मोरि हवेली
झुन्झुनु – (1) योने-याँठी की हवेली – महनसर
(2) गोयनका हवेली डूडलोद
(3) बागडिया व डालमिया की हवेली चिडावा
सीकर – (1) पंसारी की हवेली
केडिया एवं राठी की हवेली-लरमणगढ

(1) चीखे का अभिलेख ?
उदयपुर के चीरवा गाव के मन्दिर में रचित इस शिलालेख में मेवाड़ के गुहिव वंशी शासकों (जैन सिंह, तेजसिंह, समर सिंह) के उपसस्थियों का उल्लेख
रत्नप्रभसूरी ने इस लेख की रचना की थी इस लेख में उस समय की धार्मिक लिपि की जानकारी भी मिलती है
(2) कुवलयमाला ?
क्ुवलयमाला पुस्तक जैन मुनि उद्योतन सुरी द्वारा 779 ई. में जालोर दुर्ग में लिखि गई
इसमें 18 देशी भाषाओं का उल्लेख उनमें मरु भाषा भी है
(3) राज रत्नाकर ?
राज रत्नाकर के लेखक सदाशिव थे राज रत्नाकर में महाराणा राजसिंह सिसोदिया के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है
(4) राजस्थान साहित्य अकादमी ?
राजस्थान साहित्य अकादमी की स्थापना 1950 में उदयपुर में की गई थी।
अकादमी की मासिक पत्रिका-मधुमति
अकादमी का सर्वोच्य पुरुस्कार – मीरा पुरुस्कार

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