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भारतीय राज व्यवस्था

Q. 1 : नीति निर्देशक तत्वों की उपादेयता बताइये।
उत्तर :
ये भारतीय संघ के सभी अधिकृतों हेतु अनुदेशों की तरह है तथा ये उन्हें नए सामाजिक व आर्थिक व्यवस्था के मूल सिद्धान्तों की याद दिलाते है।
ये न्यायालयों की न्यायिक समीक्षा की शक्ति के प्रयोग मे सहायता करते है। ये प्रस्तावना को विस्तृत रूप देते है जिनसे भारत के नागरिकों की न्याय, स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुत्व के प्रति बल मिलता है। ये मूल अधिकारों के पूरक है तथा भाग-3 में, सामाजिक व आर्थिक अधिकारों की व्यवस्था करते हुए रिक्तता की पूरा करते है। अतः इनके क्रियान्वयन द्वारा व्यक्ति मूल अधिकारों का पूर्णतः उपयोग कर पाता है। ये विपक्ष को सरकार पर नियंत्रण व प्रभाव बनाने में सक्षम बनाता है यदि सरकार के कार्य निदेशक तत्वों के विरूद्ध हो। 0 लोग इन निर्देशों के आलोक में सरकार के प्रदर्शन का परीक्षण कर सकते है।
ये आम राजनीतिक घोषणापत्र की तरह होते है।


Q. 2 : न्यायिक सक्रियता से आप क्या समझते है?
उत्तर : जब न्यायपालिका, कार्यपालिका पर प्रभावी निगरानी रखे और सरकारी नीतियों एवं संसदीय कानूनों में प्रभावी बदलावों को कार्यान्वित करती है। सकारात्मक रूप में न्यायपालिका, कार्यपालिका एवं विधायिका को बेहतार कार्य हेतु प्रेरित करती है, उदाहरण- जनहित याचिका। लेकिन जब न्यायपालिका स्वयं ही विधायी (कानून निर्माण) एवं कार्यकारी कार्य करना शुरू कर दे तो यह न्यायिक अतिसक्रियता या नकारात्मक न्यायिक सक्रियता कहलाती है, उदाहरण- दिल्ली में डीजल वाहनों पर अतिरिक्त करारोपण। हाल के समय में नकारात्मक न्यायिक सक्रियता अधिक देखी जा रही है।


Q. 3 : राजस्थान में निर्वाचन व्यवहार को प्रभावित करने में जाति की भूमिका
उत्तर : आजादी के पश्चात सामन्ती जातियों में (राजपूत) में कांग्रेस के प्रति विरोध था तथा जमींदारी व्यवस्था के उन्मुलन के कारण किसान जातियों ने कांग्रेस का समर्थन किया। SC/ST जातियों ने संवैधानिक उपबन्धों के कारण कांग्रेस को समर्थन दिया। जातिगत संस्थाएँ दबाव समूह की तरह बनी तथा राजनीतिक लाभों के लिए विभिन्न दलों का समर्थन व विरोध किया। चौथी विधानसभा में अजगर फॉर्मुला अपनाया गया जिसमें अहीर, जाट, गुर्जर, व राजपूत जातियाँ 2003 विधानसभा में वसुंधरा सरकार ने जातिगत समीकरणों के आधार पर राज्य की राजनीति को प्रभावित किया। हालांकि शैक्षणिक विकास के साथ-साथ इस प्रभाव में कमी आती जा रही है।

Q. 4 : केन्द्र-राज्य आयोग पर सरकारिया आयोग की मुख्य सिफारिशें बताइये।
उत्तर : अनुच्छेद 263 के तहत एक स्थायी अंतर्राज्यीय परिषद् का गठन होना चाहिए।
अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) की बहुत संभलकर इस्तेमाल किया जाए।
अखिल भारतीय सेवाओं को अधिक मजबूत बनाना चाहिए तथा ऐसी ही कुछ सेवाओं का निर्माण किया जाना चाहिए।
कराधान की शक्ति संसद में निहित रहनी चाहिए तथा अन्य शक्तियों को समवर्ती सूची में शामिल किया जाना चाहिए।
जब राष्ट्रपति राज्य के किसी विधेयक को स्वीकृति हेतु रखे तो इसका कारण राज्य सरकार को बताया जाना चाहिए।
राज्यपाल विधानसभा में बहमत की स्थिति में सरकार को भंग नहीं कर सकता।
बिना संसद की अनुमति के किसी राज्य मन्त्री के विरूद्ध जांच आयोग नहीं बैठना चाहिए।
केन्द्र को बिना राज्यों की स्वीकृति के सैन्य बलों की तैनाती की शक्ति प्राप्त हो

Q. 5 : भारतीय संविधान में राज्यसभा को प्राप्त विशेष शक्तियाँ कौनसी है?
उत्तर : संघीय चरित्र होने के कारण राज्यसभा को दो विशेष शक्तियाँ दी गई है जो लोकसभा के पास नहीं है
अनुच्छेद 249- यह संसद को राज्यसूची में से विधि बनाने हेतु अधिकृत कर सकती है।
अनुच्छेद 312- यह संसद की केंद्र व राज्य दोनों के लिए नयी अखिल भारतीय सेवा के सृजन हेतु अधिकृत कर सकती है।
अनुच्छेद 67- उपराष्ट्रपति को पद से हटाने की प्रक्रिया केवल राज्यसभा में ही शुरू की जा सकती है।


Q. 6 : भारतीय संविधान का आधार एकात्मक है। विवेचन कीजिए।
उत्तर : भारतीय संविधान में संघात्मक विशेषताएं जैसे द्विसदनात्मक व्यवस्था एवं शक्ति पृथ्थकरण तथा एकात्मक विशेषताएँ जैसे शक्तिशाली केन्द्र व आपातकालीन प्रावधान दोनों मौजूद हैं। बोम्मई वाद (1994) में सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान को संघात्मक माना तथा संघात्मक व्यवस्था को इसका मूल ढांचा माना। सरकारिया एवं पुछी आयोग ने भी इसे संघात्मक माना है। बी.आर. अम्बेडकर के अनुसार सामान्य स्थिति में यह संघात्मक है लेकिन आपातकाल में यह एकात्मक हो जाता है। अन्ततः हम कह सकते हैं कि एकात्मक एवं संघात्मक दोनों विशेषताओं की उपस्थिति इसे अर्द्ध-संघीय प्रदान करती है।


Q. 7 : भारतीय निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता एवं निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए संविधान में प्रदत उपबंध बताइये।
उत्तर : मुख्य निर्वाचन आयुक्त को अपनी निर्धारित पदावधि में काम करने की सुरक्षा है।
उसे उसके पद से उसी रीति से व उन्हीं आधारों पर ही हटाया जा सकता जैसे उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को अन्यथा नहीं।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सेवा की शर्तों में उसकी नियुक्ति के पश्चात् अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जा सकता।
अन्य निर्वाचन आयुक्त या प्रादेशिक आयुक्त की मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश पर ही हटाया जा सकता है।
ये प्रावधान निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता व निष्पक्षता को सुनिश्चित तथा संरक्षित करते है।


Q.8 : 42वाँ संविधान संशोधन
उत्तर : 1976 में हुआ यह संशोधन आजतक का सबसे व्यापक संशोधन है जिसे लघु संविधान भी कहा जाता है।
संविधान में समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखण्डता शब्द जोड़े गए।
मूल कर्तव्यों को समाहित किया (भाग-IVक) – राष्ट्रपति के लिए मंत्रिमण्डल की सलाह को अनिवार्य बनाया।
2001 तक लोकसभा एवं राज्य विधायिकाओं में सीटों की संख्या 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर कर दी गई।
संविधान संशोधन पर न्यायपालिका की शक्ति को सीमित किया।
न्यायिक पुनरावलोकन एवं रिट क्षेत्राधिकार में कटौती।
मूलअधिकारों के उल्लंघन के आधार पर नीति निर्देशक तत्वों को लागू करने हेतु निर्मित कानूनों को वैध माना गया।
संघ के किसी भाग में आपात की उद्घोषणा को सरल/संभव बनाना इत्यादि इसके प्रमुख बिन्दु थे


Q 9 : केन्द्रीय सतर्कता आयोग का संगठन एवं प्रमुख कार्य बताइये।

उत्तर : एक केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त व दो या दो से कम सतर्कता आयुक्त होते है। सीवीसी का अपना स्वयं का सचिवालय होता है जो सचिव, संयुक्त सचिवगण, उपसचिवगण, आदि से मिलकर बना होता है। इसकी एक मुख्य तकनीकी शाखा होती है जो मुख्य अभियंता तथा सहायक स्टॉफ से बनी होती है। विभागीय पड़ताल हेतु इसकी एक विभागीय शाखा भी होती है।
कार्य :
केन्द्र सरकार के निर्देश पर ऐसे सिविल सेवक की जाँच करना जिसने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 के तहत अपराध किया हो।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत की गई जांच में सीबीआई की कार्यप्रणाली पर नजर रखना।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा चलाने हेतु संबंधित प्राधिकरणों को दिए गए लंबित प्रार्थना पत्रों की समीक्षा करना।


Q. 10 : संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में स्थाई सदस्यता भारत के दावे को आधार प्रदान करने वाले कारक बताइये।
उत्तर : कारक :
भारत संयुक्त राष्ट्र का संस्थापक सदस्य था।
मानव जनसंख्या के 1/6 भाग का प्रतिनिधित्व करने वाला विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र।
यू.एन. के शांति मिशन में दूसरा सबसे बड़ा योगदानकर्ता 07 बार सुरक्षा परिषद् की सेवा कर चुका है।
6th सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था तथा दूसरी सबसे तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्था।
भारत ने अन्तर्राष्ट्रीय शांति व सुरक्षा बनाए रखी है।
धार्मिक/ साम्प्रदायिक सौहार्द को प्रोत्साहित करने हेतु कार्य किया।
जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, सतत विकास आदि समस्याओं के समाधान में सक्रिय रूप से संलग्न।


Q.11 : POCSO अधिनियम में वर्णित मुख्य अपराध बताइये।
उत्तर : POCSO अधिनियम उन सभी लोगों को दण्डित करता है जो निम्नलिखित अपराधों में संलिप्त हैं
प्रवेशन लैंगिक हमला (धारा-3)
गुरूत्तर प्रवेशन लैंगिक हमला (धार-6)
लैंगिक हमला (धारा-7) – गुरूत्तर लैंगिक हमला (धारा–9)
यौन उत्पीड़न (धारा-11) 0 अश्लील चित्रण (धारा-13)


Q. 12 : शीतयुद्धोत्तर दौर में विश्व व्यवस्था में विकसित नए रूझान क्या हैं?

उत्तर : नए रूझान :-
यू.एस.ए के एकमात्र शक्ति के रूप में एकधुवीय विश्व का निर्माण, अब बहुध्रुवीयता की ओर प्रगतिशील रूप से अग्रसर
वैश्विक स्तर पर पूंजीवाद को अपनाया गया।
वैश्विकरण । परस्पर आर्थिक निर्भरता में वृद्धि
संचार क्रांति ने विश्व को एकीकृत किया।
जलवायु परिवर्तन, वैश्विक आंतकवाद, साइबर अटैक, क्रिप्टो करेंसी जैसी नई समस्याओं का आगमन ।
दक्षिण-दक्षिण सहयोग में धीमी प्रगति
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की प्रासंगिकता पर प्रश्नचिन्ह


Q. 13 : भारत और अमेरिका के बीच रक्षा क्षेत्र सहयोग पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर : भारत-यू.एस. रक्षा संबंध रक्षा तकनीक एवं व्यापार पहल रूप में नवीनीकृत (2015) रक्षा फ्रेमवर्क समझौते (2005) द्वारा प्रोत्साहित किए गए जो रक्षा व्यापार पर ध्यान केन्द्रित (अब लगभग 15 बिलियन डॉलर का व्यापार, सी-130 हरक्यूलस, C-17 ग्लोबमास्टर, अपाचे, चिनूक एयरक्राफ्ट के साथ ) करता है। भारत 22 गार्जियन ड्रोन खरीद रहा है तथा सामरिक व्यापार प्राधिकरण का दर्जा-1 (SAT-1) प्राप्त किया है। भारत ने 3 आधारभूत समझौतों GSOMZA (2002), LEMOA (2016) तथा COMCASA (2018/ हाल ही में 2+2 वार्ता में) पर हस्ताक्षर किए है। बी.ई.सी.ए. अभी भी हस्ताक्षरित करना शेष है। मालाबार युद्धाभ्यास भी प्रगाढ़ सहयोग को दर्शाता है।


Q. 14 : BRICS की प्रासंगिकता पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर : विश्व की 41% जनसंख्या और 22% जी.डी.पी. का प्रतिनिधित्व करने वाला ब्रिक्स 5 विकासशील देशों (ब्राजील, रूस, भारत, चीन तथा दक्षिण अफ्रीका) का एक ऐसा मंच है जो बहुध्रुवीयता के लिए मार्ग तय कर रहा है। न्यू डवलपमेन्ट बैंक तथा आकस्मिक आरक्षित व्यवस्था (2014) की स्थापना से आई.एम. एफ को सुधारों की लागू करने हेतु मजबूर किया है तथा वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्था प्रदान की है। नियमित सम्मेलनों का आयोजन करना, आतंकवाद का मुकाबला, जलवायु परिवर्तन, आपदा प्रबंधन, व्यापार, क्रेडिट राशनिंग आदि क्षेत्रों में सहयोग ने ब्रिक्स की प्रासंगिकता को सिद्ध किया है।

Q.15 : सोलर चरखा मिशन
उत्तर : सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्यमों की महत्वपूर्ण आर्थिक भूमिका (देश के लगभग 60% रोजगार व 10% वृद्धि में योगदान ) को चिन्हित करते हुए 27 जून 2018 (एम.एस.एम.ई दिवस) को उद्योग संगम में राष्ट्रपति द्वारा शुरू किया गया मिशन। योजना का उद्देश्य देश की 5 करोड़ महिलाओं को इस पहल से जोड़ना है। आरम्भिक 2 सालों में 1 लाख नौकरियाँ सृजित होने की उम्मीद है। सरकार योजनान्तर्गत शुरूआती दो वर्षों में 50 क्लस्टर (एम.एस.एम.ई क्षेत्र के ) के लिए 550 करोड़ रूपये की सब्सिडी देगी(प्रत्येक समूह में 400 से 2000 कारीगर होगें) जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उत्पन्न होगा और हरित अर्थव्यवस्था के निर्माण में सहायता मिलेगी।


Q.16 : सामान्यज्ञ-विशेषज्ञ विवाद के मुख्य बिन्दु क्या है? इनके मध्य स्वस्थ संबंध हेतु कौन-कौन से उपाय सहायक हो सकते हैं?
उत्तर : विवाद के मुख्य बिन्दु :
सामान्यज्ञों को प्राप्त वेतन, पदोन्नति व अन्य सुविधाएँ विशेषज्ञों की तुलना में अधिक है।
बिना किसी तकनीकी ज्ञान के सामान्यज्ञ नीति व कार्यक्रम बनाते हैं। जिन्हें विशेषज्ञों को क्रियान्वित करना पड़ता है।
सामान्यज्ञों का व्यवहार निरंकुश नौकरशाह जैसा
विशेषज्ञों के निर्धारित पदों पर सामान्यज्ञं का वर्चस्व व सामान्यज्ञों द्वारा विशेषज्ञों को अधीनस्थ मानकर व्यवहार करना।
स्वस्थ संबंध हेतु सुझाव :
एकीकृत पदसोपानिक व्यवसथा को अपनाया जाए भारतीय संघ सेवा का गठन।
यह पूर्व निर्धारित हो कि किस विभाग का प्रधान अधिकारी सामान्यज्ञ होगा
नई अखिल भारतीय सेवाओं का गठन – चिकित्सा, शिक्षा, कृषि आदि।
दोनों को एक जगह प्रशिक्षण- सचिवालय, निदेशालय को एकीकृत कर दिया जाए।
1st ARC के अनुसार इन्हें कार्यात्मक व गैर कार्यात्मक सेवाओं में विभाजित किया जावे


Q.17 : कमिश्नरेट व्यवस्था से आप क्या समझते है? क्या आप मानते हैं कि इस व्यवस्था ने जिला कलेक्टर की स्थिति को कमजोर किया है?
उत्तर : कमिश्नरेट व्यवस्था से तात्पर्य उस पुलिस व्यवस्था से है जिसमें संबंधित शहर की पुलिस व्यवस्था परंपरागत पुलिस अधीक्षक के बजाय पुलिस आयुक्त को सौंप दी जाती है। पुलिस आयुक्त के पास जिला दंडनायक वाली शक्तियाँ, CRPC की धारा 107-124, 133, 134, 135, 144, 144A की शक्तियां शस्त्र अधिनियम के तहत लाइसेंस देने, शहर में कयूं लगाने, मजिस्ट्रट संबंधी शक्तियां आदि होती है। यह कहना उचित नहीं होगा की कलेक्टर की स्थिति कमजोर हुई है बल्कि कलेक्टर की स्थिति कम होने से वे विकास कार्यों में अधिक ध्यान दे पाएंगे व पुलिस शीघ्र त्वरित, निष्पक्ष ढंग से कानून व्यवस्था से संबंधी चुनौतियों का समाधान निकालेगी।


Q.18 : राज्य वित्त आयोग के मुख्य कार्य गिनाते हुए समझाइए की क्या यह संस्था केवल कागजी संस्था है?
उत्तर : राज्य वित्त आयोग का गठन अनुच्छेद 243 1 व 243 II के तहत 5 वर्ष हेतु किया जाता है।
कार्य :- स्थानीय निकायों को वित्त आवंटन हेतु सिद्धांत व पद्धति का निर्धारण करना।
कर, ड्यूटी, टोल, फीस आदि का राज्य व स्थानीय निकायों में बंटवारा स्थानीय निकायों द्वारा लगाए जाने वाले कर, चूंगी, फीस आदि का निर्धारण करना।
राज्य की संचित निधि से स्थानीय निकायों को अनुदान संबंधी सिफारिश
स्थानीय निकायों की वित्तीय सुदृढ़ता संबंधी उपाय सुझाना
चूँकि यह परामर्शदात्री निकाय है अतः राज्य सरकार द्वारा इनकी सिफारिशों को गंभीरता से नही लिया जाना वहीं, इसकी स्थिति संघीय वित्त आयोग की तुलना में कमजोर होने के कारण इसे कागजी संस्था कहा जाता है। अतः राज्य को सहाकरी संघवाद व विकेन्द्रीकरण की संवैधनिक भावना को साकार करने हेतु वित्त आयोग की सिफारीश को महत्व देना चाहिए।


Q.19 : गुलिक के POSDCORB सिद्धांत की आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए।
उत्तर : P- Planning (नियोजन) – संसाधनों को ध्यान में रखकर योजना बनाना।
O-Organising (संगठित करना)- मानव श्रमशामिधन, तकनीक, कच्चा माल को व्यवस्थित करना।
S-Staffing (कर्मिकों की व्यवस्था)- कार्मिकों की भर्ती, प्रशिक्षण, वेतन, पदोन्नति, स्थानांतरण की व्यवस्था करना।
D-Directing (निर्देश देना)- उच्चाधिकारी द्वारा अधीनस्थों को निर्देश व मार्गदर्शन प्रदान करना।
co- Co-ordinating (समन्वय करना)- संगठन में विभिन्न इकाइयों, व्यक्तियों, कार्यों के मध्य समन्वय
R- Reporting (प्रतिवेदन)- प्रत्येक अधीनस्थ उच्चाधिकारीयों को कार्य की प्रगति, बाधा, सफलताओं से अवगत करवाए।
B-Budgeting – संगठन में आय व व्यय का हिसाब लगाना।
निष्कर्षतः POSDCORB को केवल प्रबंधकीय प्रकृति का होना, लोकप्रशासन के मुख्य कार्य का अभाव मानवीय तत्वों के POSDCORB के अभाव आदि बिन्दुओं के आधार पर आलोचना की जाती है।

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